mahabharat kahani

हंसना अच्छा है

महाभारत भारत के दो प्राचीन महाकाव्यों में से सबसे बड़ा महाकाव्य है जिसकी रचना वेदव्यास ने की थी | महाभारत की पौराणिक कथाओ के जरिये हम जीवन के हर पहलू को अच्छी तरह समझ सकते है | हमने महाभारत की इस महान कथा को एक लड़ी में पिरोने केक छोटा सा प्रयास किया है जिसमे हस्तिनापुर के राजा भरत के राज से लेकर कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरवो के विनाश तक की सारी घटनाए मौजूद है | मित्रो हमारे इस प्रयास में थोड़ी से आपको त्रुटि लगे तो क्षमा करे |


महाभारत की कथा महर्षि पाराशर के कीर्तिमान पुत्र वेदव्यास की देन है | व्यासजी ने महाभारत की यह कथा सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को कंठस्थ कराई थी बाद में अपने दुसरे शिष्यों को | मानव जाति में महाभारत की कथा का प्रसार महर्षि वैशपायंन के द्वारा हुआ | वैशपायन व्यास जी के प्रमुख शिष्य थे |ऐसा माना जाता है कि महाराजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने एक बड़ा यज्ञ किया | इस महायज्ञ में सुप्रसिद्ध पौराणिक सूत जी भी मौजूद थे | सूतजी ने समस्त ऋषियों की एक सभा बुलाई | महर्षि शौनक इस सभा के अध्यक्ष हुए |

सूतजी ने ऋषियों की सभा में महाभारत की कथा आरम्भ की कि महाराज शांतनु ने उनके पुत्र चित्रांगद हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठे थे | उनकी अकाल मृत्यु हो जाने पर उनके भाई विचित्रवीर्य राजा हुए | उनके दो पुत्र हुए – धृतराष्ट्र और पांडू | बड़े बेटे धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे इसलिए उस समय की निति के अनुसार पांडू को गद्दी पे बैठाया गया | पांडू ने कई वर्षो तक राज्य किया | उनकी दो रानिया थी कुंती और माद्री | कुछ समय पश्चात अपने किसी अपराध का प्रायश्चित करने के लिए जंगल में गये | उनकी दोनों रानिया भी उनके साथ ही हो गयी | वनवास में के समय कुंती और माद्री ने पांच पांड्वो को जन्म दिया |

कुछ समय बाद पांडू की मृत्यु हो गयी | पांचो अनाथ बच्चो को वन के ऋषि मुनियों ने पालन पोषण किया और पढ़ाया लिखाया | जब युधिष्ठिर सोलह वर्ष के हुए तो ऋषियों ने पांचो कुमारो को हस्तिनापुर ले जाकर पितामह भीष्म को सौंप दिया | पांचो पांडव बुद्धि से तेज और शरीर से बलि थे | उनकी प्रखर बुद्धि और मधुर स्वभाव ने सबका मन मोह लिया था | यह देखकर धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव उनसे जलने लगे और उन्होंने पांड्वो को तरह तरह से कष्ट पहचाना शुरू कर दिया | दिन पर दिन कौरवो और पांड्वो के बीच वैरभाव बढ़ता गया | अंत में भीष्म पितामह ने दोनों को किसी तरह समझाया और उनके बीच संधि कराई | भीष्म के आदेशानुसार कुरु राज्य के दो हिस्से किये गये | कौरव हस्तिनापुर में ही राज करते रहे और पांड्वो को एक अलग राज्य दे दिया गया ,जो आगे चलकर इन्द्रप्रस्थ नाम से मशहूर हुआ |उन दिनों राजा लोगो में चौसर खेलने का आम रिवाज था | राज्य तक की बाजिया लग जाती थी } इस रिवाज के मुताबिक एक बार पांड्वो और कौरवो ने चौपड़ खेला | कौरवो की तरफ से कुटिल शकुनि खेला | उसने युधिष्ठिर को हरा दिया | इसके फलस्वरूप पांड्वो का राज्य छीन गया और उनको तेरह वर्ष का वनवास भोगना पड़ा था | उसमे एक शर्त यह भी थी कि बारह वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष अज्ञातवास करना होगा | उसके बाद उनका राज्य उन्हें लौटा दिया जाएगा |द्रौपदी के साथ पांचो पांडव बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास में बिताकर वापस लौटे पर लालची दुर्योधन ने लिया हुआ राज्य वापस करने से इंकार कर दिया | अत: पांडवो को अपने ही राज्य के लिए लड़ना पड़ा | युद्ध में सारे कौरव मारे गये तब पांडव उस विशाल साम्राज्य के स्वामी हुए | इसके बाद 36 वर्ष तक पांड्वो ने राज्य किया और फिर अपने पोते परीक्षित को राज्य देकर द्रौपदी के साथ तपस्या करने के लिए हिमाचल में चले गये |

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